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Saat Phere (सात फेरे)

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Saat Phere



दिवाली की अगली सुबह थी, मैं कई सालों बाद इतने इतमिनान से घर आ पाया था .... रात भर मम्मी - पापा से बातें की थी ...छोटी बहन के ताने सहे थे ... और अपने आप को वचन दिया था कि अब हर दूसरे महीने आया करूँगा घर वालों से मिलने अपने शहर। झूठा कहीं का .... मैं जानता था बड़े शहर जाते ही फिर से जैसे घड़ी की सुई बन जाऊंगा, जो रोज़ उसी रास्ते पर बे-मक़सद, बे-मुरौव्वत दौड़ती रहती है। बिना रुके, बिना सोचे समझे या शायद बहुत ही सोची समझी ज़िन्दगी जी रहा हूँ मैं, जैसे ज़िन्दगी गणित हो mathematics या physics का equation... मैं गणित जैसी ज़िन्दगी नहीं जीना चाहता था .. । मैं चाहता था एक ज़िन्दगी जिसमें दशहरे के मेले का शोर हो .... जिसमें 415 नम्बर की बस फिर से miss कर देने की झुंझलाहट हो, जिसमें गुप्ता जी के जलेबी की मिठास हो .... जिसमें गर्मी की दोपहर में उसके इन्तज़ार का सन्नाटा हो, जिसमें उसकी बे-मतलब, बे-साक्ता, बे-परवाह हँसी की खनक हो .... । पर मेरी ज़िन्दगी सिर्फ maths का equation बन के रह गयी थी। अंकिता की शादी हो रही थी ...... । इतने सालों ख़ामोशी से, बेवकूफी से जिसको चाहा मेरे शहर की वो पड़ोसन किसी और शहर में किसी और की पड़ोसन बनने जा रही थी .... । मैं जानता था मैं उसकी शादी में जाने की हिम्मत नहीं कर पाऊंगा ....... लेकिन एक बार उसका चेहरा देखे बिना शहर छोड़ने का दस्तूर भी तो नहीं है।

मैंने मम्मी को आवाज़ देके कहा .... मम्मी परांठे मत सेको ... नाश्ता मैं आ के करूँगा।

7 मिनट बाद मैं उसी पुराने लकड़ी के दरवाज़े के सामने अंकिता की दहलीज़ पे खड़ा था। शास्त्रों में लिखा है "कोई पत्थर से न मारो मेरे दीवाने को ..." पर वो शास्त्रों को कहाँ मानती थी ... । दरवाज़ा खोला .... न स्वागत, न आव-भगत, दुवा न सलाम ... गुस्से के कंकड़ आँखों से बरसाने चालू कर दिए .... बोली .... घड़ी ठीक करवा के आने में 3 साल लगते हैं??? huh! यही तो कह के गया था मैं ... बस अभी आया .... शहर छोड़ रहा हूँ ये उससे काफी समय तक बता ही नहीं पाया ... पर जब बताया तब वो मुझसे दूर जा चुकी थी। कुछ भी तो नहीं बदला था इस घर में ... जहाँ मैं एक शर्मीला आशिक़ अपने दिल की बात छुपाये कितनी शामें बिताता था।

drawing room में सामने अंकिता की debating की trophy, अंकल की retirement के दिन की तस्वीर, एक गुलदस्ते में प्लास्टिक के फूल ... । Pandey अंकल अन्दर से आये, सब्ज़ी का थैला लेके .... बाजार जा रहे थे .... बोले ... अरे .. तुम्हारी ख़ैर नहीं है अब .... इतने दिन क्यों नहीं आये?? इसका अब पूरा हिसाब थानेदार साहिबा को देना पड़ेगा ... ।

अंकल के जाते ही मुझे लगा जैसे मैं और वो फिर से कॉलेज में थे और history की क्लास साथ में bunk करके आये थे। मैंने कहा .... सुना है शादी कर रही हो .. congratulatios ... वो बोली .. प्याज़ के पकौड़े खाओगे?? मैंने उसकी आँखों में देखा और कहा .... "तुम खुश हो ना ....??" वो कुछ पल खामोश रही फिर बोली .... तुमने कभी कह के तो देखा होता .... मैंने कहा ... कहना बहुत चाहा ... वो बोली ... तुम बस चाहते ही रहना, कुछ करना मत ...। तुम्हारे साथ 6 फेरे लेने के बाद मैं पिछले 3 साल से सोंचती रही कि शायद तुम्हें आखिरी फेरा याद आ जाये .... । मैंने कहा 6 फेरे ...?? उसने कहा ... दूल्हा काफी भुलक्कड़ है ...।

पास में कहीं Primary School की छुट्टी हो रही थी ... । वही कानफोड़ू घण्टी फिर बज रही थी ....। स्कूल के बसों का शोर, ice cream और चाट वालों की चीख - पुकार, साइकिल की घंटियाँ, बच्चों की हँसी ....। पर वो मेरे मोहल्ले की सबसे बातूनी लड़की अचानक चुप हो गयी थी ..... । मैंने फिर से कहा .... 6 फेरे ... ?

वो बोली ..... शिवम् की शादी के एक दिन पहले मनीष नगर मार्केट गए थे .... मेरी स्कूटी ख़राब थी और मैंने तुम्हें अपनी bike पे मार्केट ले जाने को कहा .... । क्रिकेट का मैच था फिर भी तुमने ना नहीं कहा .... । मैंने वर्मा सूट भण्डार से साड़ी के फॉल खरीदे ... दुकानदार से 10 - 10 रुपये पे झक झक की और जब तुम हँसने लगे तो तुम्हें घूर के चुप कराया ... ।

मैं फ़िरोज़ाबाद bangle स्टोर से एक घण्टे तक चूड़ियाँ खरीदती रही। हर रंग पर तुम्हारी सलाह मांगी ... । पूजा सामग्री की दुकान से हवन का सामान खरीदा .... लाल धागा, रोली, गणेश जी की आरती की किताब, चन्दन, अगरबत्ती के पैकेट ... । फिर अग्रवाल स्वीट्स में तुम्हें छेने का रसगुल्ला चखाया ..... । तुम्हें पसंद था इसलिए 2 किलो पैक कराया .... बाद में तुम्हारे चक्कर में डाँट भी खाई, क्योंकि रसगुल्ले नहीं मुझे मोतीचूर के लड्डू लाने थे। फिर फलों की दुकान से फलों की टोकरी wrap कराई और तुमसे बिना मतलब ऐसे ही पूछा .... "तुम्हें नाशपाती ज्यादा पसंद है या चीकू .... " फिर चाट खाने की ज़िद की और तुम्हें खींच के ले गई .... । दो - दो प्लेट टिक्की खाई ... , एक - एक प्लेट गोलगप्पे और मज़े लेके तीखा पानी पिया ... । वही वर्मा सूट भण्डार वाली दुकान में .... "वो हमारा पहला फेरा था .... ।"

मैं जैसे अपने दिल की धड़कन महसूस ही नहीं कर पा रहा था .... । वो चाय के cups लेके kitchen में गयी। मैं पीछे पीछे चलता रहा ... । कप धोते हुए बोली .... याद है माँ ज़िद करती थी मैं सोमवार का व्रत रखूँ ... कहती थी अच्छा पति मिलेगा .... । तुमको न जाने मेरे व्रत से क्यों दुश्मनी थी .... शायद चाहते ही नहीं थे कि अच्छा पति मिले। एक दिन तुमने गुस्से में कहा .... मैं भी चलूँगा मन्दिर .... देखूँ तो कैसे मिलता है अच्छा पति .... । वो बोली .... शायद मेरे और अच्छे पति के बीच में अडंगा लगाना चाहते थे .... । मैंने कहा ... मुझे तुम्हारा अच्छा पति ढूँढने से कोई परेशानी नहीं थी ... तुम दिन - भर भूखी रहती थी इससे परेशानी थी .... । वो बोली .... एक बार कह के तो देखा होता .... इतनी परेशानी नहीं उठानी पड़ती .... ।



मन्दिर में हमने फूलवाले के पास चप्पलें उतारी, handpump पर हाथ धोए, गेंदे के फूल खरीदे और फिर मैं कई भगवानों से अपनी deals करने निकल पड़ी ... ।

हनुमान जी के छोटे से मन्दिर होते हुए शिवलिंग पे जल चढ़ा के, दुर्गाजी की मूर्ति पे माथा टेकने के बाद, फूलवाले से फिर अपनी चप्पलें वापस ली .... "ये हमारा दूसरा फेरा था ......"

दो महीने बाद होली की शाम मेरे हाथों की बनी गुझिया खाने मैंने तुम्हें जबरदस्ती घर बुलाया ... । तुमने झूठी तारीफ़ की .... । kitchen में पानी पीने गए ..... । मैं पीछे से प्लेट रखने आयी ... फिर तुम्हें न जाने क्या हुआ कि तुमने मुझे ज़ोर से बाँहों में जकड़ लिया .... । पहली बार तुम्हारी बाँहों ने हमारी नज़दीकियों को नाप लिया था .... "ये था तीसरा फेरा ..... "

मुझे और चाय पीने का मन था .... पर उसे अपने पापा का कुर्ता प्रेस करना था .... बोली ... खुद ही बना लो .... । मैं अदरख छीलने लगा .... वो kitchen के सामने टेबल पर प्रेस करते हुए बोली .... याद है तुम्हें वो लड़की जो हर दूसरे दिन तुम्हें चिट्ठी लिखा करती थी?? क्या नाम था उसका .... प्रिया ... । मैंने कहा pen friend थी मेरी ... लेकिन तुम कितना जलती थी उससे .... वो बोली ... जलती क्यों नहीं .... इतनी बड़ी - बड़ी आँखें और लम्बे लम्बे बाल जो थे उसके .... । याद है जब उसने पहली बार अपनी फ़ोटो भेजी थी ... तुम मेमने की तरह फ़ोटो निहार रहे थे ... और मैं उसे छीन के भाग गयी थी। तुम मेरे पीछे भागे ... dining table के बगल से ... फिर kitchen में aunty को रास्ते से हटाते हुए .... पीछे के दरवाज़े से बाहर lawn में .... गुलाब की क्यारियों के पास, पीपल के पेड़ के बगल से। तुम्हारे चक्कर में छोटू की साइकिल भी गिर गयी थी ...... फिर वापस आ के तुम्हारे कमरे में हाँफते हुए तुम्हारे bed पे बैठ गयी थी ..... । तुमने गुस्से में वापस फ़ोटो छीन ली थी .... "वो हमारा चौथा फेरा था ..... ।"

मेरे birthday पे हम सब अप्पू घर गए थे .... मैंने ज़िद की कि मैं marigoround पे बैठूंगी .... कोई और जाने को तैयार नहीं हुआ फिर तुमने कहा चलो मैं चलता हूँ ..... । जैसे ही झूला चलने लगा मुझे चक्कर सा आ रहा था ... मैं डर गयी थी .... तुमने सबसे नज़र चुराकर मेरा हाथ पकड़ लिया था .... "वो हमारा पाँचवा फेरा था .... ।"

फिर तुम चले गए .... उसके पिछले दिन लोहड़ी थी। त्यौहार के दिन मैं कितना रोई थी। मोहल्ले के सारे लोग लोहड़ी की परिक्रमा कर रहे थे .... और आग के चारों ओर चलते हुए मुझे सिर्फ तुम्हारा चेहरा दिख रहा था ... । तुम मुझसे नज़रें चुरा रहे थे, उस मुसाफिर की तरह जो अपने हमसफर को लम्बे रास्ते पे पैदल चलता छोड़ के ज़िन्दगी की किसी नई बस में सवार हो गया हो ..... । तुम एक नया सफ़र शुरू करने जा रहे थे .... और मेरा रास्ता जैसे खत्म हो रहा था ....."वो हमारा छठा फेरा था .... ।"

6 फेरे .... सब कुछ याद था उसे ...... । जैसे उन लम्हों की उसने गाँठ बाँध के रख ली हो ..... । मैं अफ़सोस के समंदर में जैसे धीरे - धीरे डूबता जा रहा था। सोंच रहा था कि खुद के अलावा किसको blame करूँ .... । काश हम लड़के भी लड़कियों की तरह रो सकते ..... । काश अपनी तकलीफें ख़ामोशी में दफ़न नहीं करनी पड़ती .... ।

5 बजने वाले थे ..... । सर्दी की शाम मेरे चेहरे से लिपट रही थी ..... । उसे खो देने का एहसास इतना गहरा था कि और कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था ..... ।

उसने दूर सड़क पे देखा उसके पापा वापस आ रहे थे ...... । मैं जानता था कि ये कुछ लम्हें मेरे और इसके बीच के आखिरी लम्हे थे .... ।

Pandey अंकल सब्ज़ी का थैला लेके नीचे सीढ़ियों पे पहुँच गए थे ..... । अचानक मैंने उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों पे महसूस किया ..... । मेरी आँखों में देखकर उसने कहा ..... "काम अधूरा छोड़ने की आदत बहुत पुरानी है तुम्हारी ..... आओ आखिरी फेरा पूरा कर लें ..... ।" उसके पापा सीढ़ियों से चलते आ रहे थे। उसने center table पे एक मोमबत्ती जलाई और मेरा हाथ थाम के चारों ओर एक चक्कर लगाया ..... ।

दरवाज़े पे घण्टी बजी .... पापा आ चुके थे ..... । वो बोली ..... "मुझे खोने का ग़म मत करना .... हमारे बीच जो था उसे याद करके कभी - कभी मुस्कुरा लेना .... ।" घण्टी फिर से बजी .... । वो बोली ..... manners नहीं है क्या ....... ? दूसरी शादी की मुबारकबाद भी नहीं दोगे ..... ??


"बस इतना सा असर होगा हमारी यादों का .....कि कभी - कभी तुम बिना बात मुस्कुराओगे ....."



Story Written By - Pratyush Aryan (Pramod Verma) B.Sc. B.Ed. (Maths) Teacher, Web Designer And Writer


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