Snack's 1967

logo

Sanwali Ladki (सांवली लड़की)

Ads:


SanwaliLadki



रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी, तो क्या सोचेंगे आप? यही न कि नाम और रूप रंग में कोई तालमेल नहीं। जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया, उसी दिन से छात्रों के जेहन में यह बात कौंधने लगी। किसी की आंखों में व्यंग्य होता, किसी की मुसकराहट में, कोई ऐसे हाय हैलो करता कि उसमें भी व्यंग्य जरूर झलकता था। चांदनी सब समझती थी। मगर वह इन सबसे बेखबर केवल एक हल्की सी मुस्कान बिखेरती हुई सीधे अपनी क्लास में चली जाती। केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी, वह तो ठेठ एक कसबाई लड़की नजर आती थी। किसी छोटे मोटे कसबे से इंटर पास कर आई हुई बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूप रंग में ढले हुए छात्र छात्राओं को भला उसकी शालीनता क्या नजर आती। हां, 5-7 दिन में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया कि वह मेधावी भी है। बोर्ड परीक्षा की मेरिट लिस्ट में अपना स्थान बनाने वाली लड़की। इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता, जो उसका प्रोजेक्ट देखते वे कभी प्रोजेक्ट की फाइल देखते, तो कभी चांदनी का चेहरा। रोहित क्लास का मुंहफट छात्र था। एक दिन वह चांदनी से पूछ बैठा, ‘‘मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का आटा खाती हैं?’’ चांदनी कुछ नहीं बोली। बस, चुपचाप उसे देख भर लिया। तभी नीलम के मुंह से भी निकला, ’’हां, हां, जरूर बताना ताकि हम भी उसे खाकर अपने दिमाग को तरोताजा रख सकें।’’ रोहित और नीलम की ये फबतियां सुन पूरी क्लास ठहाका मार कर हंसने लगी। लेकिन चांदनी के चेहरे का सौम्य भाव इससे जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। वह मुस्करा कर केवल इतना बोली, ‘‘हां, हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी,’’ फिर उसका ध्यान अपनी कॉपी पर चला गया। चांदनी गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी। छुट्टी का दिन था। लड़कियां हॉस्टल के मैदान में वॉलीबॉल खेल रही थीं। कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं, तो कुछ मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं। साथ आए बच्चे हरी हरी घास पर लोट पोट हो रहे थे। वहीं कॉरीडोर में एक किनारे कुर्सी पर बैठी हॉस्टल वार्डन रीना मैडम सारे दृश्य देख रही थीं। उनके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उनकी आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं। उनका हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा, इस वक्त चिंता में डूबा हुआ था। कॉरीडोर में लड़कियां इधर से उधर भागदौड़ मचाए हुए थीं। मगर शायद किसी का भी ध्यान रीना मैडम पर नहीं गया। अगर गया भी हो तो किसी ने उनके चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी। अचानक रीना मैडम के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा। उन्होंने सिर उठा कर देखा, वह चांदनी थी, ‘‘कहां खोई हुई हैं, मैडम? आपकी तबीयत तो ठीक है न,’’ चांदनी ने पूछा। ‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैं ठीक हूं चांदनी,’’ रीना मैडम बोलीं। ‘‘नहीं मैडम। कुछ तो है। छिपाइए मत, आपका चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं।’’ रीना मैडम की आंखें नम हो आईं। चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उनसे बताए बिना नहीं रहा गया। वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं, ‘‘चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबीयत ठीक नहीं है। वह मुझे बहुत याद कर रहा है। मैं कुछ समय के लिए उसे यहां लाना चाहती हूं। लेकिन यहां मैं हर समय तो उसके पास रह नहीं सकती। घर से कोई और आ नहीं सकता। ऐसे में कौन रहेगा, उसके पास?’’ ‘‘बस, इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं। मैडम, बस समझ लीजिए कि आप की प्रॉब्लम दूर हो गई। उदासी और चिंता को दूर भगाइए। घर जाकर बच्चे को ले आइए।’’ ‘‘मगर कैसे?’’ ‘‘मैं हूं न यहां,’’ चांदनी बोली। रीना मैडम ने उसका हाथ पकड़ लिया। वे चकित होकर उसे देखती भर रहीं। उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। क्या हॉस्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है। आज ऐसा पहली बार हुआ था, पर चांदनी की आंखों से झांकती निश्छलता कह रही थी, ‘हां, मैडम, यह सच है। मुझे हर किसी के दर्द और चिंता की पहचान हो जाती है।’ रीना मैडम की आंखों में एक बार फिर आंसू छलक आए। ‘‘न… न… न… मैडम, आपकी ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं। जो मैंने कहा है उसे कीजिए,’’ चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उनके आंसू पोंछती हुई बोली। धीरे धीरे साल बीत गया। चांदनी बीए द्वितीय वर्ष में पहुंच गई। वह टैलेंटेड तो थी ही, उसके व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उसकी अपनी एक अलग पहचान बना दी थी। मगर रोहित जैसे साहब जादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था। अब भी वे मौका मिलने पर उस पर व्यंग्य करने से नहीं चूकते थे। नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनी अपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई। इसमें उन छात्र छात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ लाने के लिए कहा जाता था। चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी। रोहित के लिए चांदनी पर फबती कसने का यह अच्छा मौका था। उसने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘चलो, अच्छा है। इस बार हमें भी मैडम के मम्मी पापा के दर्शन हो जाएंगे।’’ मम्मी पापा, ‘‘अरे, बेवकूफ, मैडम तो गांव से आई हैं। वहां मम्मी पापा कहां होते हैं,’’ एक दोस्त बोला। ‘‘फिर?’’ रोहित ने पूछा। ‘‘अपनी अम्मां और बापू को लेकर आएंगी मैडम,’’ दोस्त के इस जुमले पर पूरी मित्रमंडली खिलखिला पड़ी। ‘‘चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबंद कैसा नजर आता है,’’ रोहित इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका। समारोह के दिन प्राचार्य और स्टाफ के साथ शहर के कुछ गण्यमान्य लोग भी स्टेज पर बैठे हुए थे। प्राचार्य ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक एक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को स्टेज पर बुलाना शुरू किया। चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजरें उधर उठ गई। चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरे धीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी। वह एक सामान्य हिंदुस्तानी महिला जैसी थी। वहां उपस्थित दर्जनों सजी संवरी शहरी महिलाओं से बिलकुल अलग। मगर सलीके से पहनी सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिंदूर विहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उसका आत्मविश्वास। लेकिन साधारण होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था। वह चांदनी की मां थी। वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थीं, जिन्हें कोई छात्र अपने साथ स्टेज पर ले गया। उनके स्टेज पर पहुंचते ही प्राचार्य ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। फिर एक कुर्सी मंगा कर उन्हें बैठाया। अब आगे चांदनी को बोलना था। उसने थोड़े से नपे तुले शब्दों में बताया, ‘‘ये मेरी मां हैं। गांव में रहती हैं। पिताजी के देहांत के बाद मुझे कभी उनकी कमी महसूस नहीं होने दी। इन्होंने मां और पिता दोनों की जगह ले ली। मुझे पढ़ाने के इनके इरादों में जरा भी कमी नहीं आई। आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत है। ‘‘काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था कि मैं कौन सी चक्की का आटा खाती हूं। मैंने उनसे वादा किया था कि समय आने पर आप को जरूर बताऊंगी। आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है। मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है, मेरी मां। तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया। इनका प्रोत्साहन पाकर ही मैं आगे बढ़ी हूं। मेरा आज का मुकाम, आप के सामने है। इससे भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं। उसके लिए मुझे आप की शुभकामनाएं चाहिए।’’ चांदनी के चुप होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। प्राचार्य ने स्वयं उठकर उसकी मां को स्टेज की सीढ़ियों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया। रोहित और उसके दोस्तों को आज पहली बार एहसास हुआ कि उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है बल्कि उसके भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है। बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति रोहित ही था, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमा याचना लिए हुए, चांदनी ने गद्गद होकर उसके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया।




Story Written By - Pratyush Aryan (Pramod Verma) B.Sc. B.Ed. (Maths) Teacher, Web Designer And Writer


Home