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Story World - Pratyush Aryan

आज से 15 साल पहले की बात है। मैं 11वीं में पढ़ता था। वो लड़की हमारी क्लास में नई - नई आई थी। उसके पैर में कुछ लचक थी, शायद कुछ चोट लगी होगी इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी। उसने 10वीं क्लास में पूरे उत्तर प्रदेश में टॉप किया था और मैंने अपने स्कूल में। दिखने में तो वो बहुत ही खूबसूरत थी। मगर कहते हैं न कि चाँद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उसके पैर की वह चोट उसकी खूबसूरती पर दाग बन गई थी। उसने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था। उसकी सादगी की चर्चा हर जबान पर थी। शुरुआत के कुछ महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे। सबको उसके खूबसूरती से मतलब था, उससे नहीं। हम लड़कों की सोच कितनी गिरी हुई होती है न?? लड़की को इस्तेमाल करने की चीज समझते हैं। इस्तेमाल किया और फेंक दिया। मगर सबकुछ जानते हुए भी उसने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। न ही नाराजगी से और न ही खुशी से और एक मैं था, जो अभी तक उसका नाम तक नहीं जानता था। सच कहूं, तो मैंने कभी कोशिश ही नहीं की थी आखिर नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे। हर कोई उसे अलग अलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उसका असली नाम। मैंने उसकी आंखें देखी थीं। कुछ कहना चाहती थीं उसकी आंखें शायद, मगर क्या?? ये जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं। मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी। अनाथ था न मैं। अपना सबकुछ खुद ही देखना था। अपना भविष्य खुद बनाना था। जिस उम्र में लड़के तरह तरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था। भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी। कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए। उस लड़की ने क्लास में फिर से टॉप कर दिया। मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उसने खत्म कर दिया था। हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सिमरन, तुमने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टॉप किया है।’’ मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया। मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था। टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे 95.8 फीसदी नंबर आए हैं। तुम दूसरे नंबर पर हो।’’ इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है। मगर फर्क क्यों है, इसका जवाब मुझे खुद को देना था। यह जवाब मैं कहां से लाता? मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा। सब लड़के खुश थे। जो फेल थे वो भी, क्योंकि उन्हें उसका असली नाम पता लग गया था। क्लास खत्म होने पर मैं उससे मिला और बधाई दी। वह इसकी हकदार भी थी, इसलिए उसने भी मुझे बधाई दी। यह हमारी पहली मुलाकात थी। इसके बाद आगे के दिनों में धीरे धीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से। दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था। फाइनल इम्तिहान आने वाले थे। हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं। मगर मैंने कभी सिमरन के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था। फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना।’’ मगर कहां मिलना, ये नहीं बताया। मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो ये था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था। क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं। तो क्या फिर उसके घर में? मगर उसका घर तो मुझे पता ही नहीं। तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना। मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उसके इस जवाब ने। इम्तिहान खत्म हुए। हम मिले, हम फिर मिले, हम बार बार मिले। एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एक दूसरे के साथ की। फिर एक दिन मैंने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है। मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम सी गई थीं ... कि इतनी प्यारी लड़की के माँ - बाप नहीं हैं। इतनी खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी। समझ आ गया था मुझे कि उसकी आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी। मुझे आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैंने कभी सोचा भी नहीं था। फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने बड़ी हसरत से उससे पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि सिमरन क्या बोल रही है। मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उसके चेहरे पर हंसी नहीं दिख रही थी। ‘‘सिमरन, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैंने बहुत जिज्ञासा से पूछा। जब उसकी आंखें सब कुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उसकी जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था। वह चाह रही थी कि उसका यह दोस्त उसकी आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उसके दोस्त थे। मगर उसने नहीं बताया और मैंने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उसका भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है। हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरे धीरे बहुत करीब आ गए थे। एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था। मैं जानना चाहता था उसका और उसके सूखे पत्तों का ये रिश्ता। मैं इतना करीब तो था उसके, मगर उसके दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे। फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उससे सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझसे ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था। स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई। उससे मिले हुए काफी दिन गुजर गए। अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था। सिमरन लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और ...... । फिर एक दिन मैंने स्कूल जाकर पता किया। कितना बेवकूफ था न मैं?? इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह रहती कहां है। मैं अपने टीचर के पास गया और सिमरन का पता पूछा। टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सिमरन तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है।’’ मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में। जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी। टीचर बोले, ‘‘अरे, ये क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उसके हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’ ‘‘पता नहीं, सर। मगर ये मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला और क्यों भागा ये मैं भी नहीं जानता। शायद मुझमें हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की। न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे। मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं। थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से और डर था उसे खो देने का। डर था मुझे कि ये चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा या उसकी ये चिट्ठी मेरे लिए पहली और आखरी थी। क्या करूं, कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। अभी पढ़ूं कि नहीं। मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे। सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं। फिर सोचा, ‘शायद उसने इस में अपना नया पता लिखा हो।’ बहुत हिम्मत कर के मैंने वो चिट्ठी खोल दी ... उसमें लिखा था: ‘प्यारे दोस्त राघव, ‘मैं जानती हूं कि ये चिट्ठी पढ़ने से पहले तुमने हजार बार सोचा होगा। तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा। मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उनमें सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों? ‘राघव, मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं। मैं अपने माता पिता की इकलौती लड़की थी। जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था। जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था। मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था। तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था। ‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उनकी जान ले ली। उन्होंने मुझे बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं। मैं भी रो रही थी। फिर मां ने मुझे छोड़ा और घर बंद करके खुद को आग लगा ली। मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई। ‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली। जिस उम्र में औलाद को उसकी मां के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझसे छिन गया था। मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए। ‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था। उस वक्त मुझे बचाने वाले वे सूखे पत्ते ही थे, जिनसे मैंने कभी बात तक नहीं की थी। उन बेजबानों ने मुझे एक नई जिंदगी दे दी थी। मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था। ‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है। मैं उनका कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया। ‘मुझे जब भी इस बेशर्म दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें चिट्ठी लिखती हूं। मैं इनका एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोंका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सिमरन ... ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं... हमेशा। ‘मैं जानती हूं राघव कि तुम ये चिट्ठी अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे होगे, और तुम्हारी आंखें नम होंगी। मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए। मगर महसूस करके देखना .... मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह। ‘तुम्हारी सिमरन।’ मेरी आंखें सच में भर आई थीं। एक आह निकल गई थी मेरे दिल से। आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उसके इतने करीब .. एक सच्चे दोस्त की तरह ...। कितना जानती थी वो मुझे ... उसे पता था कि मैं ये चिट्ठी उस बाग में ही पढ़ूंगा। अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागते भागते मुझे इस बाग में ले आए थे। मैं सिमरन के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सिमरन की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोंका आया, जिसने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सिमरन मेरे बहुत करीब है .... बहुत ही करीब ..................। आज भी जब मुझे सिमरन की याद आती है मैं उसी बाग़ में चला जाता हूं .... सिमरन की दुनिया में .... । बस इतनी सी है ये कहानी ....
Story Written By - Pratyush Aryan (Pramod Verma) B.Sc. B.Ed. (Maths) Teacher, Web Designer And Writer