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Story World - Pratyush Aryan

"पापा, ये गुलाब वाला टेडी बेयर अच्छा है ना, खरीद दो ना पापा" दिव्या ने ज़िद की। "नहीं बेटा, आपको इससे भी बड़ा वाला टेडी बेयर खरीद दूँगा, ठीक है?" "नहीं, मुझे बड़े खिलौने से डर लगता है। मुझे यही चाहिए"। उस टेडी बेयर का दाम 945 रुपये है। अख़बारों में चित्र बनाकर जीवन यापन करने वाले मुझ जैसे प्रेस आर्टिस्ट के लिए यह बड़ी राशि है। मैंने सोंचा,नहीं.. नहीं.. हम गरीब नहीं... भूखे नहीं रहते हैं। छोटी मोटी ज़रूरतें आसानी से पूरी हो सकती हैं..। मेरे सहकर्मी की शादी है। कुछ उपहार खरीदने के लिए यहाँ इस दुकान पर आया हूँ। लेकिन अपने साथ दिव्या को ले आना मेरी भूल है। वह तो अभी भी उस टेडी बेयर को खरीदने की आशा में उसे हाथ में पकड़े हुए है। पर मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दिव्या के साथ ईमानदारी से रहना ही बेहतर है। "बेटा, देखो इसका दाम, 945 रुपये। मतलब लगभग 1000 रुपये। पापा के पर्स में देखो कितने पैसे हैं, सिर्फ 350 रुपये।" तो हम इसे अभी नहीं खरीद सकेंगे। लेकिन मैं आपके जन्मदिन तक जरूर खरीद दूँगा, अगले महीने में ही। "ठीक है ना," "वादा?" "हाँ, मैं वादा करता हूँ। अगले दिन शाम को जब मैं दफ़तर से लौटा, दिव्या आकर मुझसे लिपट गयी, और बोली "पापा, अब तो 29 दिन ही बाकी....'' "किस लिए बेटा?'' "मेरे जन्मदिन के लिए। गुलाब वाला टेडी बेयर ख़रीदकर अपने घर आने के लिए।'' हर शाम जब मैं घर लौटता, दिनों की संख्या की याद दिलाने लगी दिव्या । मैंने निश्चय किया कि दिव्या के जन्मदिन तक मैं उसे टेडी बेयर खरीद दूँगा। लेकिन कैसे? हर महीने मुझे कुछ न कुछ अतिरिक्त काम मिलता है। कोई स्पेशल एडीशन या कलर सप्लिमेंट या कम से कम कैलंडर या पोस्टर के लिए आर्ट वर्क मिल जाता है। जो अतिरिक्त आमदनी मिलती है, उस से हमारे परिवार में छोटी- छोटी खुशियाँ - किसी के लिए नए कपड़े लेना, नहीं तो परिवार के साथ सिनेमा या पिकनिक जाने का ख़र्च निकलता है। अगर ऐसा कोई काम मिल जाए तो उस कमाई से मैं इस बार टेडी बेयर खरीद दूँगा, लेकिन इस महीने ऐसा मौका दिखाई नही देता। दिव्या के जन्मदिन की सुबह मैं बहुत उदास मन से जागा। टेडी बेयर खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। किसी न किसी तरह कमाना है। बिना नाश्ता किये, जल्दी से घर से निकलना चाहता हूँ। दिव्या सो रही है। चुपचाप कमरे से बाहर आने लगा, तो दिव्या ने कंबल से सिर उठाया और बोली "पापा, मुझे birthday wish करना भूल गये?'' "मेरी परी रानी को जन्मदिन मुबारक'' भरे गले से बोलते हुए मैंने उसके माथे को चूम लिया, लेकिन आँसुओं को नीचे नहीं गिरने दिया। कमरे से बाहर आते समय दिव्या ने मुझे एक बार फिर याद दिलाया, "पापा, आज आप टेडी बेयर लायेंगे ना। मैं आपका इंतजार करूँगी''। मैं चुपचाप से दफ़तर चला गया। शाम होने लगी। अचानक विचार आया कि घर लौटते समय, उपसंपादक से मिलकर 1000 रुपये उधार माँग लूँगा। महीने के अंत में वेतन में से काटने को कहूँगा। इस महीने के कुछ खर्च कम करने होंगे, परवाह नहीं। यह सोचकर मैं उपसंपादक के केेबिन की ओर बढ़ गया। उन्हें अपनी विवशता बताई। लेकिन उन्होंने रुपये देने की बजाय एक प्रस्ताव रखा। "देखो, तुम उधार माँग रहे हो पर मैं तुम्हें अतिरिक्त कमाई का रास्ता बताता हूँ। तुम इन तीन कहानियों के चित्र बना डालो। 1200 रुपये दूँगा। लेकिन चित्र तो आज रात को ही प्रेस में जाने हैं। मतलब, तुम्हें अभी, इसी वक्त यहीं बैठ कर चित्र बनाने होंगे। तुम्हारे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। ज्यादा से ज्यादा दो घंटे लगेंगे। तुम आठ बजे तक, पैसे लेकर घर जाकर अपनी बेटा की जन्मदिन की पार्टी धूमधाम से मना सकते हो, सोंच लो।" मेरे पास दूसरा विकल्प नहीं है। सच पूछो तो मैं क्या कोई भी चित्रकार, समय की सीमा में बैठकर अच्छे चित्र नहीं बना सकता। खैर, मैं काम पर लग गया - समय को, दिव्या को, उसके जन्मदिन को और टेडी बेयर को भूल गया। जब काम पूरा करके, पैसे लेकर बाहर निकला तो घड़ी में 9:00 बजने वाले थे। उपहार खरीदने के लिए तेज़ कदमों से दूकान पहुँचा लेकिन तब तक दुकान बंद हो चुकी थी। मैं निराश होकर घर लौट आया। बरामदे में आते ही मेरी पत्नी ने शिकायती स्वर में कहा - "बेचारी ... जब भी दरवाज़े पर आहट होती थी, बाहर आकर आपके लिए देखती थी। शाम से कुछ नहीं खाया उसने। कहती रही, "पापा आयेंगे, टेडी बेयर लायेंगे। तब मैं, पापा और टेडी बेयर मिलकर एक साथ खायेंगे। अभी अभी सोई है"। मैं हतोत्साहित हो गया। खाने की इच्छा भी जैसे गायब हो गयी। उदास मन से, सम्मान स्वरूप भेजी गई एक पत्रिका के पन्ने उलटने लगा। उसमें किसी प्रतियोगिता के नतीजे छपे थे। इस प्रतियोगिता में विजेताओं को इनाम के रूप में गिफ्ट कूपन दे रहे थे। इन गिफ्ट कूपनों को चुनी हुई दुकानों में देकर मनपसंद सामान ख़रीदा जा सकता था। झट से मुझे एक उपाय सूझा। एक चार्ट-पेपर लेकर, उस पर गुलाबवाले टेडी बेयर का चित्र बनाया। आकार और रंग में वह बिलकुल असली टेडी बेयर लगता था। उस चित्र पर आदत के अनुसार मैंने By Pratyush लिख दिया। एक चॉकलेट का बाक्स, जिसे मेरी पत्नी ने ख़रीदा था, और इस चित्र को साथ लेकर हमने दिव्या को जगाया। "दिव्या बेटा, और एक बार जन्मदिन मुबारक। लो ये चॉकलेट बाक्स और ये टेडी बेयर का चित्र तुम्हारा गिफ़्ट कूपन। कल सुबह यह गिफ़्ट कूपन दुकान पर दोगी तो, वहाँ के अंकल तुम्हें असली टेडी बेयर देंगे।" "पापा, ये टेडी बेयर का चित्र आपने बनाया क्या?'' "हाँ बेटा'' मैं पहले से ही अपनी योजना पत्नी को बता चुका था। कल किसी समय दिव्या को दुकान ले जाकर असली टेडी बेयर दिलवा देना और दुकानदार के पास पहले ही पैसे जमा कर देना जिससे दिव्या को लगे कि उसे टेडी बेयर इस टेडी बेयर के चित्र यानी गिफ़्ट कूपन के बदले में ही मिल रहा है। दिव्या मेरे बनाए गए उस चित्र को देर तक देखती रही, फिर बोली, "पापा, ये तो बिलकुल वो दुकानवाला असली टेडी बेयर लगता है। Thanx पापा, अपना वादा निभाने के लिये।'' अगले दिन दफ़तर से आने के बाद मैंने टेडी बेयर के बारे में पत्नी से पूछा ...पत्नी ने कहा, दिव्या ने पता नहीं क्यों उस टेडी बेयर का नाम ही नहीं लिया। मैं हैरान हो गया। सोचा कि मुझे खुद दिव्या को दुकान ले जाकर टेडी बेयर दिलवा देना बेहतर रहेगा। मैंने दिव्या से पूछा, "क्यों बेटा, आज हम दुकान जाकर असली टेडी बेयर को घर ले आयें?" दिव्या कुछ देर तक मुझे देखते हुए कुछ सोचती रही फिर कुछ समय के बाद बोली - "पापा, अब मैंने अपना इरादा बदल दिया है। जो चित्र आपने बनाया था न, वो बहुत सुंदर है। ऐसा सुंदर चित्रे मैं दुकान वाले अंकल को क्यों दूँ? नही पापा, मुझे वो गुलाब वाला टेडी बेयर नहीं चाहिए। मुझे यही चित्र चाहिए। दुनियाँ की किसी भी मूल्यवान वस्तु के बदले में भी मैं इस चित्र को नहीं दूँगी।'' ये देखकर मेरे आँखों में आंसू आ गए । ख़ुशी के आंसू थे या शायद दुःख के... दुःख इस बात का कि मैं अपनी परी को उपहार नही दे सका और खुशी इस बात से थी कि दिव्या को मेरा बनाया चित्र पसंद आया। ऐसी ख़ुशी हो रही थी जो मेरे चित्र को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार मिलने पर भी नहीं होती। अचानक मेरा मन हुआ कि इस दुनिया के सारे गुलाब वाले टेडी बेयर खरीद कर अपनी नन्ही राजकुमारी के क़दमों में रख दूँ।
बस इतनी सी है ये कहानी ......
Story Written By - Pratyush Aryan (Pramod Verma) B.Sc. B.Ed. (Maths) Teacher, Web Designer And Writer